

उसके पंख तो हैं, तो तुम,
समझते थे वो उड़ती है।
एक परिंदे सी, यहाँ से वहाँ,
रुकती नहीं, ठहरती सी,
फिर उड़ जाने के लिए।
वो तो हवा निकली!
महकती- बहकती सी!
बे-घर, बे-फ़िक्र, न डर-
कुछ होने का, कुछ खोने का।
कहाँ से आई वो? कहाँ है जाना?
ना कुछ संजोया, ना कुछ पाया।
कभी मधुर, कभी मंद, कभी बन जाए बवंडर!
वो कहाँ प्यालों में समाएगी?
तुम्हें कैसे समझाएगी?
खुद ही खुद को संभालेगी, वो, अब
वो अब-
अपने पंखों में ही घर बना लेगी!
