समय के खेल में,
मुसाफिर सारे हैं।
मझधार में ही तलाशते,
जाने कौन किनारे हैं?
माटी से निकाले हैं,
माटी में फिर मिल जाएंगे,
क्यों फिर, यह बेसुधी के आम हैं?
क्षणभंगुर इस जीव-खेल के,
चुनिंदा विकल्प हैं, सीमित दायरे हैं।
कोई राजा नहीं, न कोई वज़ीर है
शतरंज में यहां, सभी जूझते प्यादे हैं।
