
दो बातें, दो राहें हैं,
हर बात के दो पहलु,
हर चहरे पे पड़े नकाब,
कहीं दबे राज़,कहीं गहरे घाव!
चुने कौनसी राह? क्या है सही?
अर्जुन भी था खड़ा वहीं,
जहां मेरे कदम आके ठहरे हैं,
चेहरों पे चहेरे हैं,
यह दर्द गहरे हैं !
ज़मीर मर गया,
खून पानी हुआ,
चले गए जो अपने थे,
दबे जो यहां, गुनाह गहरे हैं।
करोड़ों भी यहीं छूट जाते हैं,
यमराज यूं बुलाते हैं,
मसीहा नही लेता रिश्वतें,
उसके हैं निष्पक्ष फैसले,
तेरे ज़मीर पे है दाग़,
मेरे आंसुओं का होगा हिसाब,
होंगे मेरे आहों के,
तुझपर वार गहरे!
देख लिए हैं मैंने अब,
जो तेरे चेहरे पे चहेर हैं!
तेरे चेहरे पे जो चहेर हैं!