
जाने क्या भरा है ज़िंदगी ने,
आपने जीवन पिटारे में ?
फिर ढक दिया है कायनात ने सबकुछ,
अटपटे व्हेमो से, अजब सवालों में।
यह पहेली तकदीर खेलती, बेहतरीन इशारों से।
हम नासमझ, फिरभी,
फसें हैं यहां, सभी,
खुदगर्ज़ी के जंजलो में।
रुसवा हैं मोहौबतें बेकद्री के वारों से!
समझना क्या?, समझाना क्या?
कुछ इल्म नहीं अब रहा!
गुम हैं राहें अब अंधियारे गलियारों में!