
जब दर्द हदसे बड़ जाता है,
याद बहुत आती है, मां
पैंतालिस हो यां नब्बे,
ताउम्र याद आती है, मां
सामने होती थी तो,कौनसे,
पहाड़ उखाड़ लेती वो?
नाज़ुक,पर मेरी ताकत थी, मां!
तेरे चूरमें के स्वादको, तरस्ती हूं अब,
दाल-चावल में कभी होती थी, मेरी दावत,
ढूंढती हूं जो सकून, जहां में,
सिमटा था तेरी कहानियों में, मां
यह ज़िंदगी सत्ताती है, तो,
याद बहुत आती हो, मां
क्योंकि, पास नहीं- तुम,
यूं एक एहसास हो, मां,
कुछ यादें, कुछ किस्से,
मेरे कुछ जज़्बात हो, मां!
