
ऐ चांद तुम इतना क्यों इतराते हो?
यह तो कवि के अलंकार हैं, जो तुम्हारी शान बड़ते हैं,
उपमा, अनुप्रास, अतिशोक्ति से तुम्हें सज्जाते हैं।
किसी और की मेहनत का श्रेय यूंही ले जाते हो!
ऐ चांद तुम इतना क्यों इतराते हो?
माना कि तुम्हारी चांदनी बेमिसाल है,
उसे संवारने में काली रात का कमाल है।
तुम तो बस उपग्रह हो,
ज्वार भाटा ही लाते हो।
तुम यूंही सातवें आसमान पे पहुंच जातेहो!
ऐ चांद तुम इतना क्यों इतराते हो?
कहीं तुम्हारी चांदनी से जग शीतल होता है,
कही कोई आंसुओं से दामन भिगोता है।
किसिकी प्रीत, किसिके विरहा-भाव जागते हो,
जो तुम उन्हें देखपाते हो,हमें क्यों चिढ़ाते हो!
ऐ चांद तुम इतना क्यों इतराते हो?
कार्तिक में पूजे जातेहों,
महारास के दर्शन करते हो।
भोले के माथे पे सज्जकर,
अपने भाग्य पर हर्षाते हो!
ऐ चांद तुम इतना क्यों इतराते हो?
जिस आभा पे तुम्हें गुमान है,
सूरज का ऐहसान है, तुम यूंही,
दोस्तों के दमपे रोब जताते हो!
ऐ चांद, तुम इतना क्यों इतराते हो?
ऐ चांद, तुम इतना क्यों इतराते हो?







