On the shore of time, My existence bleeds. The cacophony of voices Drown my senses. Directionless, rollercoaster. Much-hyped choices. Ruthless ambition. Hedonic treadmill… Unending demands for control. I let go; the need to let go. I let go. In silence. Invoking peace.
Give me a patch of heaven Give me a fresh dawn, Give me a melady Let me create my song. Be there besides me, Be my support. Let me grow in love, Don’t question my worth. Those who question my affection, For sure, deserve my absence!
बहलाते हैं ख़ुदको हम, अजब अटखेलियों से, तवज्जोह कहां है हमारी, ख़ुद अपनी जरूरतों पे? सीमित किए अपने दायरे, खु़द-से, यूंही! जकड़ी अपनी उड़ान, रिश्तों की ज़ंजीरों से!
वो कहां अपने हुए हैं अभी, यारों? फासले हैं ख्वाबों की तामीलों में।
शायद एक दिन होंगे हम, उनके, रफ़ीकों में शामिल, खुलेंगे मेरे नसीब, शायद, क्यूं बहलाते हैं खुदको, खोकली दलीलों से? फासले हैं अब भी – ख्वाबों की तामीलों में!
जो भरे हैं जाम, वो छलक ही जाएंगे, महफिल के बाद सन्नाटे फिर सताएंगे! ऊंची आवाज़ करके लाख़ छुपाएं, हम, ज़हन की खामोशी को, ऊंची आवाज़ करके लाख़ छुपाएं, हम, ज़हन की खामोशी को, सिले हैं लब, पर आंसू सैलाब बन जायेंगे, महफिल के बाद सन्नाटे फिर सताएंगे! कशमकश खुद से चल रही, क्या खोया, क्या पाया, टटोल रही, हिसाब में कमज़ोर ही थी, ताउम्र, न जाने नियामतें पायेंगे, यां ठोकरें खाएंगे, महफिल के बाद सन्नाटे फिर सताएंगे!
जाने क्या ढूंढती हैं मेरी निगाहें? तलाशती हूं कहां ख़ुदका वजूद? बीते कल के जनाज़े को कहां दफनाएंगे? कुछ याद हो तो ही उसे भुलाएंगे! भला ख़ाली पन्ने से क्या मिटाएंगे? महफिल के बाद सन्नाटे साथ निभायेंगे! ये सन्नाटे अब मेरे दोस्त बन जायेंगे!
Vo shyam kuchh ajeeb thi, yeh shyam bhi ajeeb hai… What seemed to be a pleasant journey, Was a bumpy ride. I was hoping for a greater pastures and bluer skies, Was slowly adjusted to things, Began to comply. Losing the identity. Not knowing who to rely.
As I look back at What my journey was about… All I see is Immense pain and shattering grief And as I move on, I know, For sure I now know… Vo shyam kuch ajeeb thi! Yeh shyam bhi ajeeb hai!
समय के खेल में, मुसाफिर सारे हैं। मझधार में ही तलाशते, जाने कौन किनारे हैं? माटी से निकाले हैं, माटी में फिर मिल जाएंगे, क्यों फिर, यह बेसुधी के आम हैं? क्षणभंगुर इस जीव-खेल के, चुनिंदा विकल्प हैं, सीमित दायरे हैं। कोई राजा नहीं, न कोई वज़ीर है शतरंज में यहां, सभी जूझते प्यादे हैं।
जाने क्या भरा है ज़िंदगी ने, आपने जीवन पिटारे में ? फिर ढक दिया है कायनात ने सबकुछ, अटपटे व्हेमो से, अजब सवालों में। यह पहेली तकदीर खेलती, बेहतरीन इशारों से। हम नासमझ, फिरभी, फसें हैं यहां, सभी, खुदगर्ज़ी के जंजलो में। रुसवा हैं मोहौबतें बेकद्री के वारों से! समझना क्या?, समझाना क्या? कुछ इल्म नहीं अब रहा! गुम हैं राहें अब अंधियारे गलियारों में!